पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने न्यायिक परिसरों की गरिमा और वहां उपलब्ध सार्वजनिक भूमि की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रशासनिक निर्णय लिया है। हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और भवन समिति के अध्यक्ष ने संयुक्त रूप से कड़ा रुख अपनाते हुए पंजाब और हरियाणा दोनों राज्यों की जिला अदालतों में होने वाले अवैध निर्माण और अतिक्रमण पर पूर्ण विराम लगाने के निर्देश दिए हैं। यह आदेश विशेष रूप से उन संवेदनशील समयों को ध्यान में रखकर जारी किया गया है जब अदालतों में अवकाश होता है और प्रशासनिक सतर्कता सामान्य दिनों की तुलना में कम रहती है।
न्यायालय का मानना है कि अक्सर छुट्टियों के दौरान कुछ असामाजिक तत्व या संबंधित पक्ष न्यायिक परिसरों की खाली भूमि या वकीलों के चैंबरों के आसपास अवैध रूप से निर्माण कार्य करने का प्रयास करते हैं। इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के लिए हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल कार्यालय के माध्यम से सभी जिला एवं सत्र न्यायाधीशों और जिला उपायुक्तों (DC) को स्पष्ट पत्र भेजा गया है। इसमें कहा गया है कि अदालती कामकाज बंद होने के दौरान परिसरों की सुरक्षा और वहां किसी भी प्रकार की अनधिकृत गतिविधि को रोकना प्रशासन की प्राथमिकता होनी चाहिए।
छुट्टियों के दौरान अतिक्रमण रोकने का मास्टर प्लान
हाई कोर्ट की भवन समिति ने इस बात पर चिंता व्यक्त की है कि न्यायिक परिसरों में नियोजित विकास की आवश्यकता है, लेकिन अनधिकृत निर्माण से सुरक्षा और व्यवस्था दोनों प्रभावित होती हैं। नए निर्देशों के अनुसार, अब जिला प्रशासन को उन दिनों में विशेष गश्त और निगरानी की व्यवस्था करनी होगी जब अदालतों में शीतकालीन, ग्रीष्मकालीन या अन्य लंबी छुट्टियां होती हैं। यह देखा गया है कि निर्माण सामग्री रातों-रात गिराकर अवकाश के दिनों में ढांचे खड़े कर दिए जाते हैं, जिन्हें बाद में कानूनी प्रक्रियाओं के कारण हटाना जटिल हो जाता है।
| आदेश का मुख्य बिंदु | विवरण |
|---|---|
| संबंधित प्राधिकरण | पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट, मुख्य न्यायाधीश कार्यालय |
| लक्ष्य क्षेत्र | जिला न्यायालय परिसर और वकीलों के चैंबर (Chambers) |
| निगरानी का समय | छुट्टियां, साप्ताहिक अवकाश और अदालती अवकाश |
| जिम्मेदार अधिकारी | जिला एवं सत्र न्यायाधीश (DJ) और उपायुक्त (DC) |
| कार्रवाई का प्रकार | तत्काल निष्कासन और अनधिकृत निर्माण पर रोक |
प्रशासनिक और न्यायिक अधिकारियों की जवाबदेही तय
इस आदेश की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें जवाबदेही सीधे तौर पर जिले के शीर्ष अधिकारियों की तय की गई है। जिला एवं सत्र न्यायाधीशों को अपने स्तर पर एक निगरानी तंत्र विकसित करने को कहा गया है, जो नियमित रूप से परिसर का मुआयना करे। वहीं, उपायुक्तों को यह सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं कि राजस्व और पुलिस विभाग इस कार्य में न्यायिक प्रशासन का पूर्ण सहयोग करें। यदि किसी भी जिले में छुट्टियों के दौरान अवैध निर्माण की घटना सामने आती है, तो इसके लिए संबंधित क्षेत्र के जिम्मेदार अधिकारियों से स्पष्टीकरण मांगा जा सकता है।
"न्यायिक परिसरों और वकीलों के चैंबरों में किसी भी प्रकार का अनधिकृत निर्माण नियमों का उल्लंघन है। जिला प्रशासन और न्यायिक अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि छुट्टियों के समय का लाभ उठाकर कोई भी व्यक्ति कानून हाथ में न ले। किसी भी उल्लंघन की स्थिति में तत्काल हस्तक्षेप और कड़ी कार्रवाई अनिवार्य है।"
वकीलों के चैंबरों और परिसर की सुरक्षा पर विशेष ध्यान
अदालत परिसरों में वकीलों के चैंबर अक्सर विवादों का केंद्र रहते हैं। कई बार आवंटित जगह से अधिक क्षेत्र पर कब्जा करने या बिना अनुमति के निर्माण करने की शिकायतें प्राप्त होती रही हैं। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वकीलों के बैठने की व्यवस्था और उनके चैंबरों का निर्माण केवल अनुमोदित नक्शों और नियमों के अधीन ही होना चाहिए। इसके अलावा, कैंटीन, पार्किंग और अन्य जनसुविधाओं के क्षेत्रों में भी किसी भी प्रकार के अतिक्रमण को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
भविष्य की रूपरेखा और सख्त कार्रवाई के संकेत
हाई कोर्ट के इस कदम को अदालती बुनियादी ढांचे के आधुनिकीकरण और सुदृढ़ीकरण के रूप में देखा जा रहा है। आने वाले समय में, सभी जिला अदालतों में सीसीटीवी (CCTV) निगरानी को और अधिक मजबूत किया जा सकता है ताकि डिजिटल माध्यम से भी परिसरों की चौबीसों घंटे निगरानी हो सके। इस आदेश के बाद अब हरियाणा और पंजाब के सभी जिलों में प्रशासन हरकत में आ गया है। स्थानीय निकायों और लोक निर्माण विभाग (PWD) को भी सतर्क रहने को कहा गया है ताकि सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग न हो सके।





