नूंह स्थित मेवात इंजीनियरिंग कॉलेज में पिछले सवा महीने से चल रही हड़ताल अब केवल एक प्रशासनिक मुद्दा नहीं, बल्कि एक गंभीर स्वास्थ्य संकट बनती जा रही है। विशेषकर पिछले 8 दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे छात्रों की स्थिति चिंताजनक है। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, लंबे समय तक अन्न त्यागने से शरीर के महत्वपूर्ण अंगों पर दबाव पड़ता है। साथ ही, कॉलेज परिसर और छात्रावास के रखरखाव में कमी के कारण वहां रहने वाले विद्यार्थियों के स्वास्थ्य पर भी सीधा असर पड़ रहा है।
स्वास्थ्य समस्या / सुविधा के मुख्य लक्षण और कारण
भूख हड़ताल के कारण शरीर में ग्लूकोज का स्तर तेजी से गिरता है, जिससे चक्कर आना, कमजोरी और बेहोशी जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। 8 दिनों तक भूखा रहने से शरीर की मांसपेशियों में संकुचन और गुर्दों की कार्यक्षमता पर असर पड़ने की संभावना बढ़ जाती है। यह स्थिति न केवल शारीरिक रूप से कमजोर करती है, बल्कि स्थायी स्वास्थ्य समस्याओं को भी जन्म दे सकती है।
वहीं दूसरी ओर, कॉलेज कर्मचारियों को लंबे समय से वेतन और भत्तों का लाभ न मिलना उनके मानसिक स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। आर्थिक असुरक्षा के कारण तनाव, अनिद्रा (Insomnia) और उच्च रक्तचाप (Hypertension) जैसी जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां पनप रही हैं। छात्रावास और कॉलेज भवन की जर्जर स्थिति के कारण वहां सीलन और गंदगी की समस्या भी हो सकती है, जो श्वसन संबंधी रोगों और एलर्जी का कारण बनती है।
| स्वास्थ्य बिंदु | विशेषज्ञ सलाह व सावधानियां |
|---|---|
| भूख हड़ताल (Fasting Impact) | नियमित रूप से रक्तचाप और शुगर लेवल की जांच अनिवार्य है। |
| मानसिक तनाव (Mental Stress) | अनिश्चितता के माहौल में काउंसलिंग और ध्यान (Meditation) आवश्यक है। |
| स्वच्छता (Hostel Hygiene) | छात्रावास की मरम्मत और कीटाणुशोधन (Disinfection) तुरंत होना चाहिए। |
| आहार (Nutrition) | हड़ताल समाप्त होने पर धीरे-धीरे तरल आहार से ठोस आहार पर आएं। |
डॉक्टरों व चिकित्सा विशेषज्ञों की जरूरी सलाह
चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि जो छात्र भूख हड़ताल पर हैं, उन्हें तत्काल चिकित्सकीय देखरेख में रखा जाना चाहिए। शरीर में पानी की कमी (Dehydration) न होने दें और यदि संभव हो तो ओआरएस (ORS) का घोल लेते रहें। यदि किसी व्यक्ति को अत्यधिक पसीना आए या दिल की धड़कन अनियमित महसूस हो, तो उसे तुरंत अस्पताल में भर्ती कराना चाहिए।
मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि कर्मचारियों और शिक्षकों को इस कठिन समय में अपने मानसिक स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखना चाहिए। अपनों से बात करना और सकारात्मक गतिविधियों में शामिल होना तनाव को कम करने में सहायक हो सकता है। प्रशासन को चाहिए कि वह स्वास्थ्य शिविरों का आयोजन करे ताकि आंदोलनकारियों की शारीरिक स्थिति का आकलन किया जा सके।
अस्पताल में उपलब्ध सुविधाएं और ओपीडी सेवाएं
स्थानीय स्वास्थ्य केंद्रों और ओपीडी सेवाओं के माध्यम से आंदोलनकारियों के स्वास्थ्य की निगरानी की जा सकती है। आपातकालीन स्थिति के लिए एम्बुलेंस सेवा और प्राथमिक चिकित्सा किट का परिसर में होना अनिवार्य है। डॉक्टरों की टीम को नियमित अंतराल पर छात्रों के 'वाइटल्स' (Vital signs) चेक करने चाहिए ताकि किसी भी अनहोनी से बचा जा सके।
संस्थान में स्वच्छता सुनिश्चित करने के लिए नगर निगम के स्वास्थ्य विभाग की मदद ली जा सकती है। छात्रावासों में कीटनाशकों का छिड़काव और शुद्ध पेयजल की व्यवस्था स्वास्थ्य की दृष्टि से पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। इसके अलावा, कर्मचारियों के लिए मानसिक स्वास्थ्य परामर्श सत्र आयोजित करने की भी आवश्यकता है ताकि वे इस अनिश्चितता के दौर से सुरक्षित बाहर निकल सकें।
खान-पान, दिनचर्या और घरेलू सावधानियां
आंदोलन के दौरान भी छात्रों और कर्मचारियों को अपनी जीवनशैली में कुछ बुनियादी सुधार करने चाहिए। पर्याप्त मात्रा में पानी का सेवन सबसे महत्वपूर्ण है। यदि भोजन उपलब्ध है, तो प्रोटीन और विटामिन से भरपूर संतुलित आहार लें ताकि रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) बनी रहे। जंक फूड और अत्यधिक कैफीन से बचना चाहिए क्योंकि यह तनाव को और बढ़ा सकता है।
दिनचर्या में हल्का व्यायाम या योग शामिल करना मानसिक शांति के लिए लाभकारी होगा। छात्रावास में रहने वाले छात्रों को अपने आसपास सफाई रखनी चाहिए ताकि मच्छरों और बैक्टीरिया से होने वाली बीमारियों से बचाव हो सके। अच्छी नींद लेना और सकारात्मक सोच बनाए रखना इस चुनौतीपूर्ण समय में स्वास्थ्य को बनाए रखने की कुंजी है।


