हरियाणा के डेयरी क्षेत्र और आम उपभोक्ताओं के लिए एक महत्वपूर्ण आर्थिक बदलाव की खबर सामने आई है। हरियाणा डेयरी विकास सहकारी प्रसंघ के प्रमुख ब्रांड 'वीटा' (Vita) ने अपने देसी घी की कीमतों में 10 रुपये प्रति लीटर तक का इजाफा कर दिया है। यह फैसला अंबाला सिटी स्थित वीटा प्लांट द्वारा लिया गया है, जिसका मुख्य कारण दूध की खरीद और उत्पादन लागत में हो रही निरंतर बढ़ोतरी को बताया गया है।
वीटा के मुख्य कार्यकारी अधिकारी राजेश कुमार के अनुसार, वर्तमान में खुले बाजार में दूध के दाम 85 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच चुके हैं। सहकारी प्रसंघ के लिए इतनी ऊंची दरों पर दूध की उपलब्धता और फिर उससे घी तैयार करना आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो गया था। लागत और बिक्री के बीच संतुलन बनाने के लिए संस्था के पास कीमतों में वृद्धि के अलावा कोई अन्य विकल्प शेष नहीं था।
मंडियों में फसल आवक, खरीद व एमएसपी दरें
डेयरी उत्पादों की कीमतों का सीधा संबंध कृषि क्षेत्र की उपज और मंडियों की स्थिति से होता है। वर्तमान में हरियाणा की मंडियों में खरीफ फसलों की आवक अपने चरम पर है। धान और बाजरा जैसी फसलों की सुचारू खरीद एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) पर सुनिश्चित की जा रही है। जब मंडियों में फसल की सही कीमत और समय पर भुगतान होता है, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नकदी का प्रवाह बढ़ता है, जिसका सकारात्मक असर पशुपालन और डेयरी उत्पादों की मांग पर भी पड़ता है।
हालांकि, चारे के रूप में इस्तेमाल होने वाले फसल अवशेषों की कीमतों में भी उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है। मंडियों में अनाज की आवक के साथ-साथ सूखे चारे की उपलब्धता भी पशुपालकों के लिए एक बड़ा विषय है। यदि कृषि उपज के दाम स्थिर रहते हैं, तो पशुपालकों को पशु आहार और खल-चूरी के प्रबंधन में आसानी होती है, जिससे दूध की उत्पादन लागत को नियंत्रित करने में मदद मिलती है।
| मंडी व कृषि विवरण | वर्तमान स्थिति, दरें व प्रबंध |
|---|---|
| वीटा देसी घी (नई दरें) | 10 रुपये प्रति लीटर की वृद्धि (30 अक्तूबर से प्रभावी) |
| खुला दूध बाजार भाव | 85 रुपये प्रति लीटर तक का उच्चतम स्तर |
| पशु आहार एवं चारा उपलब्धता | मंडियों में फसल अवशेषों की पर्याप्त आवक |
| सहकारी भुगतान व्यवस्था | पशुपालकों को दूध का उचित लाभकारी मूल्य सुनिश्चित |
किसानों के लिए जरूरी दिशा-निर्देश व भुगतान व्यवस्था
डेयरी व्यवसाय से जुड़े किसानों और पशुपालकों के लिए यह आवश्यक है कि वे अपनी दुग्ध समितियों के माध्यम से वीटा जैसे सहकारी संस्थानों से जुड़े रहें। सहकारी ढांचे में पारदर्शिता और समय पर भुगतान किसानों की आर्थिक रीढ़ होता है। वीटा प्रबंधन ने स्पष्ट किया है कि दूध की कीमतों में वृद्धि का लाभ अंततः उन ग्रामीण उत्पादकों तक भी पहुंचता है जो सहकारी समितियों को दूध की आपूर्ति करते हैं।
किसानों को सलाह दी जाती है कि वे अपने पशुओं के स्वास्थ्य और दूध की गुणवत्ता (फैट और एसएनएफ) पर विशेष ध्यान दें, क्योंकि सहकारी संस्थानों में भुगतान इसी आधार पर तय होता है। डिजिटल भुगतान व्यवस्था के माध्यम से अब किसानों के बैंक खातों में सीधे राशि हस्तांतरित की जा रही है, जिससे बिचौलियों की भूमिका समाप्त हो गई है और पशुपालकों को उनकी मेहनत का पूरा मोल मिल रहा है।
मौसम, खाद-बीज और फसल सुरक्षा के उपाय
आने वाले रबी सीजन को देखते हुए पशुपालकों को हरे चारे की बुवाई के लिए मौसम के पूर्वानुमान पर नजर रखनी चाहिए। हरियाणा और पंजाब में स्थापित किए जा रहे 19 नए वेदर स्टेशन किसानों को सटीक जानकारी प्रदान करेंगे, जिससे बरसीम और जई जैसी चारा फसलों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकेगी। मौसम में बदलाव के कारण पशुओं में होने वाले रोगों के प्रति भी सतर्कता बरतने की आवश्यकता है।
मिट्टी की जांच के आधार पर ही खाद और बीजों का चयन करें ताकि चारे की गुणवत्ता बेहतर हो। गुणवत्तापूर्ण चारा न केवल दूध का उत्पादन बढ़ाता है, बल्कि पशुओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता में भी सुधार करता है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसान वैज्ञानिक तरीके से फसल और पशु प्रबंधन करते हैं, तो बाजार में होने वाली मूल्य वृद्धि के प्रभाव को कम किया जा सकता है।
प्रशासनिक प्रबंध और उठान की स्थिति
वीटा प्लांट और जिला प्रशासन के बीच समन्वय से दुग्ध उत्पादों की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित की जा रही है। घी की नई दरों के लागू होने के बाद बाजार में स्टॉक की उपलब्धता और उठान की स्थिति पर कड़ी निगरानी रखी जा रही है। प्रशासनिक स्तर पर यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि त्योहारों के सीजन के बाद भी उपभोक्ताओं को शुद्ध और मिलावट रहित डेयरी उत्पाद मिलते रहें।
सहकारी समितियों से दूध के उठान के लिए लॉजिस्टिक्स को और मजबूत किया गया है ताकि दूध खराब न हो और किसानों को नुकसान न उठाना पड़े। प्रशासनिक प्रबंधों का उद्देश्य उत्पादक और उपभोक्ता दोनों के हितों की रक्षा करना है। वीटा घी की कीमतों में यह मामूली वृद्धि सहकारी संस्था की वित्तीय स्थिरता को बनाए रखने के लिए एक आवश्यक कदम के रूप में देखी जा रही है।





