हरियाणा के भिवानी जिले के अंतर्गत आने वाले नकीपुर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) में एक नवजात शिशु की असमय मृत्यु का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। इस संवेदनशील और गंभीर घटना पर राज्य मानवाधिकार आयोग ने बेहद कड़ा रुख अख्तियार करते हुए संबंधित स्वास्थ्य अधिकारियों और प्रशासनिक तंत्र से जवाबदेही तय करने के सख्त निर्देश जारी किए हैं। चिकित्सा क्षेत्र में इस तरह की लापरवाही को लेकर आम जनमानस में भी गहरी नाराजगी देखी जा रही है, जो ग्रामीण क्षेत्रों की स्वास्थ्य सेवाओं की पोल खोलती है।
यह पूरा मामला तब प्रकाश में आया जब पीड़ित परिवार ने चिकित्सा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए। उच्च जोखिम वाली गर्भावस्था (High-Risk Pregnancy) के बावजूद स्वास्थ्य कर्मियों द्वारा तयशुदा मेडिकल प्रोटोकॉल को ताक पर रख दिया गया, जिसके कारण एक मासूम को अपनी जान गंवानी पड़ी। इस मामले की गूंज अब राज्य के प्रशासनिक गलियारों तक पहुंच चुकी है, जहां न्याय की मांग तेज हो गई है।
घटना का सिलसिलेवार विवरण और मेडिकल लापरवाही की परतें
प्राप्त जानकारी के अनुसार, नकीपुर पीएचसी में जब प्रसव प्रक्रिया को अंजाम दिया जा रहा था, उस वक्त मौके पर एक भी योग्य चिकित्सक (Doctor) उपस्थित नहीं था। केवल स्टाफ नर्स के भरोसे इस जटिल प्रक्रिया को छोड़ा गया, जो नियमों का खुला उल्लंघन है। जब स्थिति बिगड़ने लगी और नवजात की तबीयत नाज़ुक हुई, तब उसे आनन-फानन में भिवानी स्थित विशेष नवजात देखभाल इकाई (SNCU) रेफर किया गया।
भिवानी के एसएनसीयू पहुंचने पर डॉक्टरों ने नवजात को मृत घोषित कर दिया। जिला चिकित्सा लापरवाही बोर्ड की गहन जांच रिपोर्ट में यह बात सामने आई कि शिशु को फौरन जीवन रक्षक चिकित्सा सहायता (Resuscitation) की सख्त आवश्यकता थी। परंतु, इस अत्यंत महत्वपूर्ण समय को कीमती टीकाकरण की कागजी औपचारिकता और प्रक्रियाओं में व्यर्थ गंवा दिया गया, जिससे मासूम की सांसें थम गईं।
| जांच बिंदु | विवरण एवं तथ्य |
|---|---|
| स्थान | प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी), नकीपुर, भिवानी |
| अध्यक्षता (आयोग पीठ) | न्यायमूर्ति ललित बत्रा, पूर्ण पीठ |
| कानूनी कार्रवाई | भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 106(1) के तहत एफआईआर दर्ज |
| अगली सुनवाई की तिथि | 12 जनवरी 2027 |
प्रशासनिक और पुलिसिया कार्रवाई का शिकंजा
मामले की गंभीरता को देखते हुए न्यायमूर्ति ललित बत्रा की अध्यक्षता वाली मानवाधिकार आयोग की पूर्ण पीठ ने स्पष्ट किया है कि केवल खानापूर्ति के लिए की जाने वाली विभागीय कार्रवाई से पीड़ित परिवार के जख्मों पर मरहम नहीं लगाया जा सकता। आयोग ने शोकाकुल परिवार को उचित आर्थिक मुआवजा दिए जाने पर भी गंभीर विचार करने के निर्देश दिए हैं ताकि इस प्रकार की प्रशासनिक चूक पर रोक लगाई जा सके।
इसके साथ ही, पुलिस अधीक्षक (एसपी), भिवानी को भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 106(1) के तहत दर्ज मुकदमे की तफ्तीश में तेजी लाने का हुक्म दिया गया है। पुलिस यह खंगालने का प्रयास कर रही है कि इस दुखद घटना के पीछे कौन-कौन से स्वास्थ्यकर्मी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार हैं।
"केवल विभागीय कार्रवाई से परिवार को हुई अपूरणीय क्षति की भरपाई नहीं की जा सकती। उच्च जोखिम वाले मामलों में चिकित्सा प्रोटोकॉल का उल्लंघन किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इस मामले में लापरवाही बरतने वालों पर सख्त कानूनी और प्रशासनिक शिकंजा कसा जाना तय है।" - हरियाणा मानवाधिकार आयोग
ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं और जीवन पर दूरगामी प्रभाव
भिवानी की यह घटना हरियाणा के ग्रामीण अंचलों में स्वास्थ्य ढांचे की जमीनी हकीकत को उजागर करती है। आज भी दूर-दराज के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर डॉक्टरों का न होना और आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए संसाधनों की कमी एक बड़ा अभिशाप बनी हुई है। जब तक जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक ऐसे हादसों पर लगाम लगाना मुश्किल होगा।
आगे की कानूनी व प्रशासनिक कार्रवाई
आयोग के कड़े तेवरों के बाद अब स्वास्थ्य विभाग के उच्च अधिकारियों को अपनी विस्तृत कार्रवाई रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी। अदालत और मानवाधिकार आयोग दोनों ही इस मामले में बेहद सतर्क हैं ताकि भविष्य में किसी अन्य माता-पिता को इस तरह की त्रासदी न झेलनी पड़े। मामले की अगली सुनवाई 12 जनवरी 2027 को निर्धारित की गई है, जिसमें कई अहम खुलासे होने की उम्मीद है।




