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हरियाणा के रोहतक में मछली पालन की नई क्रांति: खारे पानी में भी तेजी से बढ़ेगी 'कॉमन कार्प' की उन्नत नस्ल, लाहली संस्थान का बड़ा शोध

रोहतक के लाहली स्थित संस्थान में कॉमन कार्प की उन्नत तीसरी पीढ़ी पर शोध अंतिम चरण में है। खारे पानी में तेजी से बढ़ने वाली यह मछली हरियाणा के किसानों की आय बढ़ाएगी।

नीरज अहलावत
वरिष्ठ पत्रकार एवं मुख्य संपादक
3 नवंबर 2026 को 08:35 am बजे2 मिनट पठन0 व्यूज
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हरियाणा के रोहतक में मछली पालन की नई क्रांति: खारे पानी में भी तेजी से बढ़ेगी 'कॉमन कार्प' की उन्नत नस्ल, लाहली संस्थान का बड़ा शोध
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फोटो: दैनिक रियलिटी विशेष डिजिटल डेस्कdainikreality.in

खबर की मुख्य बातें (Key Highlights)

  • •रोहतक के लाहली स्थित केंद्रीय मात्स्यिकी शिक्षा संस्थान में कॉमन कार्प की तीसरी पीढ़ी पर शोध अंतिम चरण में।
  • •नई प्रजाति 0 से 8 पीपीटी तक के खारे और क्षारीय पानी में भी जीवित रहने और तेजी से बढ़ने में सक्षम है।
  • •आनुवंशिक सुधार के जरिए तैयार की गई यह मछली पारंपरिक नस्लों की तुलना में अधिक वजन और बेहतर स्वास्थ्य रखेगी।
  • •हरियाणा के उन क्षेत्रों के किसानों के लिए वरदान साबित होगी जहाँ भूमिगत जल खारा होने के कारण खेती चुनौतीपूर्ण है।

हरियाणा का रोहतक जिला, जो अब तक अपनी खेल प्रतिभाओं और राजनीतिक सरगर्मियों के लिए जाना जाता था, अब नीली क्रांति (Blue Revolution) के एक बड़े केंद्र के रूप में उभरने को तैयार है। रोहतक के लाहली स्थित केंद्रीय मात्स्यिकी शिक्षा संस्थान (CIFE) के वैज्ञानिकों ने मछली पालन के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि हासिल करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। यहाँ 'कॉमन कार्प' मछली की तीसरी पीढ़ी पर गहन शोध किया जा रहा है, जो न केवल तेजी से बढ़ेगी बल्कि हरियाणा के उन इलाकों के लिए भी उपयुक्त होगी जहाँ पानी में खारापन अधिक है।

वैज्ञानिकों का दावा है कि यह नई पीढ़ी अपने पूर्वजों (माता-पिता) की तुलना में कहीं अधिक उन्नत और अनुकूलन योग्य है। इस शोध के सफल होने से प्रदेश के मत्स्य पालकों की आय में अभूतपूर्व वृद्धि होने की संभावना है। विशेष रूप से रोहतक, झज्जर और सोनीपत जैसे जिलों में, जहाँ जलभराव और लवणता की समस्या रहती है, वहां यह मछली पालन एक लाभदायक व्यवसाय के रूप में स्थापित हो सकेगा।

मछली पालन में रोहतक की नई वैश्विक पहचान

लाहली स्थित संस्थान में चल रहा यह शोध आनुवंशिक सुधार (Genetic Improvement) पर आधारित है। वैज्ञानिकों ने देश के विभिन्न हिस्सों से कॉमन कार्प की बेहतरीन नस्लों को एकत्रित किया और उनकी ब्रीडिंग कराकर एक ऐसी 'सुपर नस्ल' तैयार की है जो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी जीवित रह सकती है। यह शोध अब अपने अंतिम चरण में है और इसके परिणाम बेहद उत्साहजनक मिल रहे हैं।

विवरणमहत्वपूर्ण जानकारी
प्रजाति का नामकॉमन कार्प (साइप्रिनस कार्पियो) - तीसरी पीढ़ी
अनुसंधान केंद्रकेंद्रीय मात्स्यिकी शिक्षा संस्थान (CIFE), लाहली, रोहतक
लवणता सहनशीलता0 से 8 पीपीटी (PPT) तक (नमकीन पानी में अनुकूल)
विकास दरसामान्य मछली से 20-30% अधिक तेज
प्रमुख वैज्ञानिकडॉ. सालोनी शिवम, डॉ. सत्यप्रकाश, डॉ. मुजाहिद खान

खारे पानी की चुनौती का समाधान और आनुवंशिक सुधार

हरियाणा के कई हिस्सों में भूमिगत जल खारा है, जिससे पारंपरिक खेती करना मुश्किल हो जाता है। कॉमन कार्प की यह नई पीढ़ी इसी समस्या का समाधान है। आमतौर पर मीठे पानी की मछलियाँ खारे पानी में जीवित नहीं रह पातीं, लेकिन आनुवंशिक सुधार के बाद यह नस्ल 8 पीपीटी तक की लवणता को आसानी से सहन कर सकती है। इसका मतलब है कि किसान अब बंजर और खारी जमीन पर तालाब बनाकर भारी मुनाफा कमा सकेंगे।

"संस्थान में कॉमन कार्प पर आनुवंशिक सुधार के लिए निरंतर कार्य किया जा रहा है। तीसरी पीढ़ी के जो परिणाम अब तक सामने आए हैं, वे बेहद सकारात्मक हैं। यह मछली तेजी से वजन बढ़ाती है, जिससे मछली पालकों का उत्पादन खर्च कम होगा और लाभ बढ़ेगा।" - डॉ. सालोनी शिवम, वैज्ञानिक, मात्स्यिकी शिक्षा संस्थान लाहली।

कॉमन कार्प (साइप्रिनस कार्पियो) की विशेषताएं

इसे यूरोपीय कार्प के नाम से भी जाना जाता है और यह दुनिया भर में सबसे अधिक पाली जाने वाली मछलियों में से एक है। यह सर्वाहारी होती है, जो पानी के तल में मौजूद कीड़े, जलीय पौधे और बीज खाकर अपना पोषण करती है। इसकी सामान्य लंबाई 30 से 60 सेंटीमीटर होती है, लेकिन उन्नत नस्ल में यह 1 मीटर तक भी जा सकती है। इसका रंग सुनहरा-भूरा होता है और इसके मुंह के पास मूंछ जैसे अंग (बारबेल) होते हैं जो इसे अन्य मछलियों से अलग पहचान देते हैं।

स्थानीय जनजीवन और किसानों पर प्रभाव

रोहतक और आसपास के जिलों के किसानों के लिए यह शोध गेम-चेंजर साबित हो सकता है। जहाँ धान और गेहूं की खेती में लागत बढ़ रही है, वहीं मछली पालन एक सुरक्षित विकल्प बनकर उभरा है। सरकार की विभिन्न योजनाओं के तहत मत्स्य पालन के लिए सब्सिडी भी प्रदान की जा रही है। नई नस्ल के आने से न केवल स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा होंगे, बल्कि हरियाणा से मछली का निर्यात दूसरे राज्यों और विदेशों में भी बढ़ेगा।

आगे की कार्रवाई और वितरण योजना

संस्थान के प्रभारी अधिकारी डॉ. मुजाहिद खान पठान के अनुसार, शोध का अंतिम चरण पूरा होते ही इस नई नस्ल के बीजों (Seeds) का परीक्षण विभिन्न क्षेत्रों के तालाबों में किया जाएगा। एक बार जब इसके परिणाम जमीनी स्तर पर पुख्ता हो जाएंगे, तो इसे व्यावसायिक उत्पादन के लिए किसानों को उपलब्ध कराया जाएगा। यह कदम हरियाणा को मछली उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।

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नीरज अहलावत (Neeraj Ahlawat)

नीरज अहलावत (Neeraj Ahlawat)वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक

DainikReality.in | पानीपत, हरियाणा | 10+ वर्षों का डिजिटल पत्रकारिता अनुभव

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नीरज अहलावत हिंदी पत्रकारिता और डिजिटल समाचार प्रकाशन के क्षेत्र में सक्रिय हैं। वे समाचारों की सटीकता, निष्पक्षता और पाठकों तक उपयोगी जानकारी पहुंचाने को प्राथमिकता देते हैं। DainikReality.in पर उनका फोकस हरियाणा की खबरों, समसामयिक घटनाओं, सरकारी योजनाओं और रोजगार पर तथ्यपरक विश्लेषण प्रस्तुत करना है।

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