हरियाणा के रेवाड़ी जिले से एक बेहद चिंताजनक खबर सामने आई है, जहाँ भविष्य के कर्णधारों यानी स्कूली बच्चों के स्वास्थ्य के साथ गंभीर लापरवाही बरती जा रही है। जिले के सरकारी स्कूलों में पेयजल की गुणवत्ता को लेकर किए गए सरकारी परीक्षण ने शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग के दावों की पोल खोल दी है। ताजा रिपोर्ट के अनुसार, रेवाड़ी के 90 सरकारी स्कूलों में पीने का पानी स्वास्थ्य मानकों पर खरा नहीं उतरा है। इन नमूनों में न केवल हानिकारक बैक्टीरिया पाए गए हैं, बल्कि टीडीएस (Total Dissolved Solids) का स्तर भी निर्धारित मात्रा से कहीं अधिक मिला है, जो बच्चों में गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है।
प्रशासनिक आंकड़ों के अनुसार, रेवाड़ी जिले में कुल 638 सरकारी स्कूल संचालित हैं। इनमें से प्रथम चरण में 263 स्कूलों के पेयजल स्रोतों की सघन जांच की गई थी। जनस्वास्थ्य विभाग की प्रयोगशाला में भेजे गए इन सैंपलों की रिपोर्ट ने अधिकारियों के होश उड़ा दिए हैं। 90 स्कूलों के पानी को असुरक्षित घोषित कर दिया गया है। विशेष रूप से बावल, नाहड़ और रेवाड़ी खंड के ग्रामीण इलाकों में स्थिति सबसे भयावह है, जहाँ भूजल का स्तर और गुणवत्ता लंबे समय से चिंता का विषय रही है।
पेयजल संकट और दूषित पानी का पूरा विवरण
जांच के दौरान यह पाया गया कि अधिकांश स्कूलों में बच्चे सीधे तौर पर हैंडपंप या बोरवेल के पानी पर निर्भर हैं। हालांकि, कुछ शिक्षण संस्थानों में जनस्वास्थ्य विभाग की ओर से पाइपलाइन के जरिए जलापूर्ति की जाती है, लेकिन वहां भी नमूनों की गुणवत्ता संदिग्ध मिली है। अगस्त और सितंबर माह के दौरान ली गई इन सैंपलों की विस्तृत रिपोर्ट अब जिला मुख्यालय पहुंची है, जिसके बाद शिक्षा विभाग में खलबली मच गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि पानी में बैक्टीरिया की मौजूदगी सीवेज या गंदगी के रिसाव का संकेत देती है, जबकि उच्च टीडीएस औद्योगिक प्रदूषण या प्राकृतिक खारेपन को दर्शाता है।
| विशेष विवरण | सांख्यिकीय डेटा / जानकारी |
|---|---|
| कुल सरकारी स्कूलों की संख्या | 638 |
| जांच के लिए लिए गए कुल नमूने | 263 |
| जांच में फेल पाए गए स्कूलों की संख्या | 90 |
| मुख्य दूषित कारक | बैक्टीरिया और उच्च टीडीएस (High TDS) |
| सर्वाधिक प्रभावित ब्लॉक | बावल, रेवाड़ी, नाहड़ |
| जांच एजेंसी | जनस्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग (PHED) लैब |
अधिकारियों की कार्रवाई और विभागीय प्रतिक्रिया
रिपोर्ट सार्वजनिक होने के बाद शिक्षा विभाग के जिला स्तरीय अधिकारियों ने कड़ा रुख अपनाया है। संबंधित स्कूलों के प्राचार्यों और मुख्य अध्यापकों को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि वे तुरंत पानी के वैकल्पिक स्रोतों का प्रबंध करें और जल भंडारण टैंकों की सफाई सुनिश्चित करें। विभागीय सूत्रों के अनुसार, जिन स्कूलों के सैंपल फेल हुए हैं, वहां दोबारा सैंपलिंग की जाएगी ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि समस्या स्थायी है या केवल अस्थाई गंदगी के कारण ऐसा हुआ है।
"बच्चों के स्वास्थ्य से किसी भी प्रकार का समझौता बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। जिन स्कूलों के पानी के सैंपल फेल हुए हैं, उन्हें नोटिस जारी कर जल स्रोतों की सफाई और क्लोरीनीकरण करने के निर्देश दिए गए हैं। जनस्वास्थ्य विभाग के साथ मिलकर दोबारा जांच कराई जा रही है ताकि शुद्ध पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित हो सके।"
स्थानीय जनजीवन और बच्चों के स्वास्थ्य पर प्रभाव
दूषित पानी पीने से स्कूली बच्चों में पेट संबंधी बीमारियां, टाइफाइड, पीलिया और त्वचा रोगों का खतरा बढ़ गया है। अभिभावकों में इस रिपोर्ट के बाद भारी रोष व्याप्त है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि एक तरफ सरकार डिजिटल इंडिया और स्मार्ट क्लासरूम की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ बुनियादी जरूरत यानी 'साफ पानी' तक बच्चों को मयस्सर नहीं है। बावल और नाहड़ जैसे क्षेत्रों में औद्योगिक इकाइयों के कारण पहले ही भूजल प्रदूषित है, ऐसे में स्कूलों में वाटर प्यूरीफायर (RO) का न होना प्रशासन की बड़ी विफलता मानी जा रही है।
आगामी कदम और सुधारात्मक योजनाएं
प्रशासन अब उन 90 स्कूलों में जल शोधन प्रणालियों की स्थापना पर विचार कर रहा है जहाँ पानी की गुणवत्ता लगातार खराब बनी हुई है। इसके साथ ही, जिले के शेष 375 स्कूलों के पानी की जांच भी अगले चरण में शुरू की जाएगी। शिक्षा विभाग ने पंचायतों और स्थानीय निकायों से भी अपील की है कि वे स्कूलों में स्वच्छ जल की आपूर्ति सुनिश्चित करने में सहयोग करें। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह लापरवाही किसी बड़ी स्वास्थ्य त्रासदी को निमंत्रण दे सकती है।





