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5 घंटे में सिर्फ 46 KM का सफर, फिर भी इस ट्रेन में सीट पाने के लिए रहती है मारामारी

Unque Train: जब भी हम ट्रेन के सफर की बात करते हैं तो जहन में तेज गति की बात आती है, लेकिन आज आपको एक ऐसी ट्रेन के बारे में बताते हैं, 5 घंटे में महज 46।

नीरज अहलावत
वरिष्ठ पत्रकार एवं मुख्य संपादक
4 नवंबर 2026 को 09:02 am बजे2 मिनट पठन0 व्यूज
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5 घंटे में सिर्फ 46 KM का सफर, फिर भी इस ट्रेन में सीट पाने के लिए रहती है मारामारी
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फोटो: दैनिक रियलिटी विशेष डिजिटल डेस्कdainikreality.in

खबर की मुख्य बातें (Key Highlights)

  • •Unque Train: जब भी हम ट्रेन के सफर की बात करते हैं तो जहन में तेज गति की बात आती है, ...
  • •प्रशासनिक व संबंधित विभाग ने मामले पर लिया त्वरित संज्ञान, जांच जारी।
  • •हरियाणा (संबंधित क्षेत्र) सहित प्रभावित क्षेत्रों में स्थिति पर रखी जा रही है निरंतर नजर।
  • •विस्तृत तथ्यों व अग्रिम अपडेट्स के लिए दैनिक रियलिटी से जुड़े रहें।

हरियाणा (दैनिक रियलिटी विशेष ग्राउंड रिपोर्ट): Unque Train: जब भी हम ट्रेन के सफर की बात करते हैं तो जहन में तेज गति की बात आती है, लेकिन आज आपको एक ऐसी ट्रेन के बारे में बताते हैं, 5 घंटे में महज 46 किलोमीटर की दूरी तय करती है।। इस पूरे घटनाक्रम को लेकर संबंधित अधिकारियों व स्थानीय स्तर पर आवश्यक संज्ञान लिया जा रहा है। प्राप्त विश्वसनीय जानकारियों व प्राथमिक तथ्यों के अनुसार, पूरे मामले को लेकर विभागीय स्तर पर आवश्यक पड़ताल जारी है ताकि घटनाक्रम से जुड़े हर पहलू की प्रामाणिक स्थिति स्पष्ट हो सके।

मामले की पूरी पृष्ठभूमि और क्या है पूरा घटनाक्रम?

जी हां हम बात कर रहे हैं मेट्टुपालयम-ऊटी नीलगिरि पैसेंजर ट्रेन की।। यह ट्रेन विश्व की सबसे धीमी चलने वाली रेलगाड़ी है।। इतनी कम गति होने के बाद भी इसमें सफर करने वालों की कमी नहीं है।। क्योंकि इस ट्रेन में सफर करने के लिए पहले ही बुकिंग करवानी पड़ती है।।

यात्रा व रूट विवरणरोडवेज सेवा अपडेट
रूट व बस सेवा5 घंटे में सिर्फ 46 KM का सफर, फिर भी इस ट्रेन में सीट
डिपो / संचालन प्राधिकरणसंबंधित राज्य विभाग व स्थानीय प्रशासन
संबंधित ज़िले / रूटहरियाणा (संबंधित क्षेत्र)
यात्रियों के लिए सुविधायात्रियों व नागरिकों की सुविधा के लिए सेवा/अभियान शुरू

अधिकारियों, पुलिस व जांच दल की क्या है भूमिका?

यह ट्रेन पिछले 100 साल से लोगों में रोमांच भर रही है।। जो भी लोग इस ट्रेन से सफर करके आते हैं, वे जीवन भर नहीं भूलने वाली यादें लेकर आते हैं।। क्यों खास है यह टॉय ट्रेन यह ट्रेन तमिलनाडु में मेट्टुपालयम से ऊटी के चलती है।। इस टॉय ट्रेन में 3 से 4 डिब्बे रहते हैं, लेकन यात्रियों की संख्या काफी अधिक होती है।। आज जब हम तेज गति और आधुनिकता से भरपूर वंदे भारत ट्रेन की बात करते हैँ, लेकिन यह ट्रेन आज भी पुराने नीले रंग के डिब्बों से चलती है।।

'प्रशासनिक स्तर पर पूरे मामले की बारीकी से मॉनिटरिंग की जा रही है। कानून और स्थापित नियमों के तहत निष्पक्ष जांच और त्वरित कार्रवाई हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है।' - संबंधित प्राधिकारी

स्थानीय जनजीवन, नागरिकों व व्यवस्था पर सीधा असर

परिवहन विभाग के इस कदम से रोजाना यात्रा करने वाले दैनिक यात्रियों, कामकाजी वर्ग और विद्यार्थियों को सीधा लाभ मिलेगा। लंबे समय से इस रूट पर सुगम यातायात सुविधा की मांग की जा रही थी, जिसे ध्यान में रखते हुए अधिकारियों ने समय सारिणी और स्टॉपेज की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित की है।

जो भी लोग ऊटी और कुन्नूर घूमने आते हैं, वे इस ट्रेन का सफर जरूर करना चाहते हैं।। क्योंकि पर्यटकों के बीच इस ट्रेन में सफर का अलग ही क्रेज देखने को मिलता है।। यही कारण है कि इस ट्रेन में सफर के लिए लोगों को पहले ही बुकिंग करवानी पड़ती है।। क्योंकि यह हमेशा ही फुल रहती है।। पहाड़ी रास्ते के कारण गति कम दरअसल यह ट्रेन पहाड़ी रास्ते से चलती है।। यही कारण है कि ट्रेन करीब 10 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से चल पाती है।। यहां पहाड़ी रास्ता इतना ऊंचा और ढलान भरा रहता है कि ट्रेन चलाना आसान नहीं है।। इसके चलते यहां विशेष प्रकार के रैक एंड पिनियन सिस्टम की मदद ली गई है।। इस ट्रेन के रास्ते में 16 से अधिक सुरंग आती हैं और 250 से ज्यादा पुल लगते हैं।। इसके अलावा 208 तीखे मोड़ भी हैं, जो यात्रियों में रोमांच भरते हैं।। यूनेस्को की विश्व धरोहर में शामिल जिस प्रकार शिमला से कालका ट्रेन यूनेस्को की विश्व धरोहर में शामिल है, ठीक उसी प्रकार यह ट्रेन भी विश्व धरोहर है।। क्योंकि पिछले करीब 120 सालों से यह ट्रेन लोगों के लिए रोमांच का केंद्र है।। हालांकि आज विकसित हुई तकनीक इस ट्रेन की गति को बढ़ा सकती है, लेकिन इस धरोहर को बचाने के लिए ऐसा नहीं किया जा रहा है।। अंग्रेजों ने चलाई यह अनोखी ट्रेन इस ट्रेन को अंग्रेजों ने चलाया था।। आज हम तकनीक की बात करते हैं, करीब 100 साल पहले जब इस ट्रेन को चलाया गया, तब यह उस समय के इंजीनियरिंग के हिसाब से बहुत चुनौती रही है।। क्योंकि अंग्रेजी शासनकाल में अंग्रेज भीषण गर्मी से बचाव के लिए ऊटी जैसे क्षेत्रों पर छुट्टियां बिताते थे।। ऐसे में ऊटी तक पहुंच के लिए इस ट्रेन को चलाने की योजना तो 1854 में बनाई गई।। लेकिन यह काम इतना भी आसान नहीं था।। क्योंकि दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों के कारण यहां पर रेल लाइन बिछाना ही आसान नहीं था।। ऐसे में 1891 में इस परियोजना का काम शुरू हुआ और 1899 में नीलगिरि माउंटेन रेलवे की स्थापना की गई।। इसके बाद 1908 में यह ट्रेन शुरू हो पाई।।

आगे की कानूनी व प्रशासनिक कार्रवाई और आगामी कदम

आगामी दिनों में इस पूरे मामले को लेकर विभागीय स्तर पर उच्चस्तरीय समीक्षा की जा सकती है, जिसके आधार पर आगे की कार्ययोजना तय होगी। दैनिक रियलिटी की विशेष ग्राउंड रिपोर्टिंग टीम पूरे मामले पर लगातार नजर बनाए हुए है और पाठकों तक सबसे पहले प्रामाणिक जानकारी पहुंचाती रहेगी।

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नीरज अहलावत (Neeraj Ahlawat)

नीरज अहलावत (Neeraj Ahlawat)वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक

DainikReality.in | पानीपत, हरियाणा | 10+ वर्षों का डिजिटल पत्रकारिता अनुभव

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नीरज अहलावत हिंदी पत्रकारिता और डिजिटल समाचार प्रकाशन के क्षेत्र में सक्रिय हैं। वे समाचारों की सटीकता, निष्पक्षता और पाठकों तक उपयोगी जानकारी पहुंचाने को प्राथमिकता देते हैं। DainikReality.in पर उनका फोकस हरियाणा की खबरों, समसामयिक घटनाओं, सरकारी योजनाओं और रोजगार पर तथ्यपरक विश्लेषण प्रस्तुत करना है।

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