हरियाणा के ऊर्जा क्षेत्र में निजीकरण की सुगबुगाहट के बीच प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में सरगर्मी काफी बढ़ गई है। दक्षिणी हरियाणा के प्रमुख जिलों गुरुग्राम और नूंह में एक निजी कंपनी को समानांतर बिजली वितरण का अधिकार दिए जाने के बाद से ही विभिन्न कर्मचारी संगठनों और यूनियनों का गुस्सा फूट पड़ा है। इसी क्रम में अब राज्य सरकार पर इस पूरे मामले को लेकर अपनी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट करने का दबाव लगातार बनता जा रहा है। सरकार के ढुलमुल रवैया और नीतिगत स्पष्टता के अभाव को लेकर श्रमिक संगठनों ने गहरी नाराजगी व्यक्त की है और मुख्यमंत्री से सीधे हस्तक्षेप की अपील की है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए इलेक्ट्रिसिटी एम्प्लाइज फेडरेशन ऑफ इंडिया (ईईएफआई) ने आक्रामक रुख अख्तियार कर लिया है। फेडरेशन की तरफ से राज्य के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी को एक विस्तृत पत्र प्रेषित किया गया है, जिसमें स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि हरियाणा सरकार केवल हरियाणा विद्युत नियामक आयोग (एचईआरसी) के फैसलों के खिलाफ अदालतों में अपील दायर करने तक अपनी भूमिका को सीमित न रखे। संगठन का कहना है कि राज्य में विद्युत व्यवस्था के बुनियादी ढांचे को निजी हाथों में सौंपने की प्रक्रिया पर सरकार को अपना आधिकारिक और स्पष्ट नीतिगत रुख जनता के सामने रखना चाहिए ताकि भविष्य की दिशा को लेकर कोई असमंजस न रहे।
समानांतर बिजली वितरण लाइसेंस और सिलसिलेवार घटनाक्रम
यह पूरा घटनाक्रम तब शुरू हुआ जब हरियाणा विद्युत नियामक आयोग (एचईआरसी) ने गत 19 अक्टूबर को एक निजी इकाई 'इलेवन पावर प्राइवेट लिमिटेड' के पक्ष में एक बड़ा फैसला सुनाया। आयोग ने इस कंपनी को गुरुग्राम तथा नूंह क्षेत्र के भीतर अगले 25 वर्षों की लंबी अवधि के लिए समानांतर बिजली वितरण का आधिकारिक लाइसेंस प्रदान कर दिया। बताया जा रहा है कि भौगोलिक दृष्टि से राज्य के ऊर्जा इतिहास में इस तरह का यह अपने आप में पहला मामला है, जहां एक ही क्षेत्र में उपभोक्ताओं को बिजली आपूर्ति के लिए सरकारी निगम के अलावा एक वैकल्पिक निजी माध्यम भी उपलब्ध कराया जा रहा है।
इस निर्णय के सामने आने के बाद से ही राज्यभर के बिजली निगमों के तमाम तकनीकी इंजीनियर, मैदानी कर्मचारी, मजदूर संगठन और विभिन्न किसान संगठन लगातार इसके विरोध में मुखर होकर सामने आ रहे हैं। विरोध कर रहे संगठनों का तर्क है कि इस तरह के समझौतों से न केवल सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की वित्तीय सेहत पर विपरीत असर पड़ेगा, बल्कि आने वाले समय में उपभोक्ताओं और ग्रामीण किसानों की मुश्किलें भी भारी पैमाने पर बढ़ सकती हैं। इसके बावजूद लाइसेंस जारी होने के बाद से प्रशासनिक गलियारों में भी इसको लेकर तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं कि आखिर इस नीति को आगे बढ़ाने के पीछे प्रशासनिक नीयत क्या है।
| मुद्दा / विवरण | तथ्य एवं स्थिति |
|---|---|
| प्रभावित क्षेत्र | गुरुग्राम और नूंह जिले |
| लाइसेंस प्राप्तकर्ता कंपनी | इलेवन पावर प्राइवेट लिमिटेड |
| लाइसेंस की अवधि | 25 वर्ष |
| लाइसेंस जारी करने वाली संस्था | हरियाणा विद्युत नियामक आयोग (HERC) |
| निर्णय की तिथि | 19 अक्टूबर 2026 |
| प्रमुख मांग करने वाला संगठन | इलेक्ट्रिसिटी एम्प्लाइज फेडरेशन ऑफ इंडिया (EEFI) |
कर्मचारी संघों का कड़ा रुख और कानूनी प्रावधानों की मांग
फेडरेशन के महासचिव सुदीप दत्ता द्वारा उठाए गए इस गंभीर मुद्दे के बाद राज्य के विद्युत महकमे में हलचल तेज हो गई है। कर्मचारियों का प्रतिनिधिमंडल लगातार यह दलील दे रहा है कि राज्य सरकार को केंद्रीय विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 108 के तहत प्रदत्त शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए अपनी दूरदर्शी नीति लिखित रूप में जारी करनी चाहिए। उनका मानना है कि जब तक सरकार इस धारा के अंतर्गत नीतिगत निर्देश जारी नहीं करती, तब तक इस तरह के फैसलों से राज्य के पावर सेक्टर में अराजकता की स्थिति पैदा हो सकती है।
जांच और विनियामक प्रक्रियाओं के जानकारों का यह भी मानना है कि यदि समानांतर लाइसेंसिंग की इस संस्कृति को बिना किसी ठोस और पारदर्शी नीति के बढ़ावा दिया गया, तो इससे राज्य के सरकारी बिजली वितरण निगमों (DHBVN और UHBVN) की कार्यप्रणाली बुरी तरह प्रभावित हो सकती है। कर्मचारी संगठनों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर जल्द ही सकारात्मक प्रशासनिक कदम नहीं उठाया गया, तो आने वाले दिनों में आंदोलन को और अधिक व्यापक रूप दिया जा सकता है, जिसकी पूरी जिम्मेदारी शासन और प्रशासन की होगी।
"हरियाणा विद्युत नियामक आयोग द्वारा निजी कंपनी को दिया गया यह 25 साल का समानांतर लाइसेंस राज्य के सार्वजनिक विद्युत ढांचे के लिए गंभीर खतरा है। सरकार केवल कानूनी अपील तक सीमित न रहे, बल्कि विद्युत अधिनियम की धारा 108 के तहत स्पष्ट नीतिगत निर्देश जारी कर अपनी मंशा साफ करे।" - सुदीप दत्ता, महासचिव, इलेक्ट्रिसिटी एम्प्लाइज फेडरेशन ऑफ इंडिया (EEFI)
आम जनजीवन, उपभोक्ताओं और कृषि क्षेत्र पर संभावित असर
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे गहरा और सीधा असर हरियाणा की आम जनता, शहरी उपभोक्ताओं और अन्नदाता किसानों की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ने की पूरी आशंका जताई जा रही है। जानकारों का कहना है कि जब एक ही भौगोलिक क्षेत्र में दो अलग-अलग कंपनियां बिजली वितरण के मैदान में उतरेंगी, तो क्रॉस-सब्सिडी और टैरिफ दरों को लेकर असमंजस की स्थिति पैदा हो सकती है। कृषि क्षेत्र को मिलने वाली रियायती बिजली और आम घरेलू उपभोक्ताओं को मिलने वाले अनुदानित शुल्कों पर इसका क्या प्रभाव होगा, इसको लेकर अभी तक स्थिति पूरी तरह कोहरे में डूबी हुई है।
दूसरी ओर, व्यापारिक संगठनों और स्थानीय नागरिकों का एक वर्ग यह मान रहा है कि निजी प्रतिस्पर्धा आने से बिजली की गुणवत्ता में सुधार हो सकता है, लेकिन इसके साथ ही टैरिफ के बेकाबू होने का डर भी बना हुआ है। ग्रामीण अंचल के किसान संगठन इस बात को लेकर सबसे ज्यादा आशंकित हैं कि कहीं इस निजीकरण के जरिए उनकी बिजली पर मिलने वाली सब्सिडी और निर्बाध आपूर्ति के वादे पर कैंची न चल जाए। यही कारण है कि यह विवाद केवल कर्मचारियों और सरकार के बीच का न रहकर अब एक व्यापक सामाजिक और आर्थिक चर्चा का विषय बन चुका है।
प्रशासनिक और कानूनी मोर्चे पर आगे की रणनीति
आगामी दिनों में इस मामले को लेकर राजनीतिक और कानूनी दोनों मोर्चों पर बड़ी हलचल देखने को मिल सकती है। एक तरफ जहां कर्मचारी संघ अपनी मांगों के समर्थन में लामबंद हो रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ प्रशासनिक स्तर पर एचईआरसी के आदेश के खिलाफ कानूनी विकल्पों को खंगालने का काम भी जारी है। हालांकि, यूनियनों का साफ कहना है कि केवल अदालती लड़ाइयां इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं हैं, बल्कि सरकार को अपनी राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिचय देते हुए नीतिगत स्तर पर इस तरह के समझौतों पर हमेशा के लिए विराम लगाना चाहिए या फिर एक सर्वमान्य ढांचा तैयार करना चाहिए।





