हरियाणा की कृषि मंडियों में भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं, इसका एक और चौंकाने वाला उदाहरण कुरुक्षेत्र जिले के पिहोवा से सामने आया है। कुरुक्षेत्र की जाट धर्मशाला में आयोजित एक प्रेस वार्ता के दौरान किसान नेता प्रिंस वड़ैच ने पिहोवा अनाज मंडी में 100 करोड़ रुपये से अधिक के धान घोटाले का दावा करते हुए पूरे प्रशासनिक अमले को कटघरे में खड़ा कर दिया है। किसान नेता ने आरोप लगाया कि यह केवल व्यापारियों या मिलर्स का काम नहीं है, बल्कि इसमें सरकार के उच्चाधिकारियों, राजस्व विभाग और कृषि विभाग के कर्मचारियों की गहरी संलिप्तता है।
प्रिंस वड़ैच ने तथ्यों के साथ दावा किया कि सरकार अक्सर किसानों पर धान की अवैध बिक्री के आरोप मढ़ती है, लेकिन हकीकत में सिस्टम के भीतर बैठे लोग ही इस पूरे सिंडिकेट को चला रहे हैं। उन्होंने बताया कि इस घोटाले को अंजाम देने के लिए एक बेहद जटिल और हाईटेक तरीका अपनाया गया है, जिससे कागजों पर सब कुछ सही दिखे लेकिन धरातल पर करोड़ों का हेरफेर किया जा सके।
घोटाले का 'नया मॉडल': कैसे हुई करोड़ों की हेराफेरी?
जांच और किसान नेताओं के दावों के अनुसार, इस बार घोटालेबाजों ने सीधे तौर पर अनाज की चोरी करने के बजाय कागजी वेरिफिकेशन में सेंध लगाई है। प्रिंस वड़ैच ने बताया कि जिन गांवों में हाल ही में जमीन की जमाबंदी (भूमि रिकॉर्ड) अपडेट हुई है, वहां के असली किसानों के रिकॉर्ड का दुरुपयोग किया गया। इन किसानों की सहमति के बिना या उनके नाम का इस्तेमाल कर फर्जी लोगों के नाम पर पोर्टल पर फसल का पंजीकरण कर दिया गया।
सबसे गंभीर आरोप 'दोहरी वेरिफिकेशन' को लेकर है। आरोप है कि एक ही किसान की फसल को कागजों में दो अलग-अलग मंडियों या दो अलग-अलग स्थानों पर पंजीकृत और सत्यापित दिखाया गया। इससे कागजों पर धान की आवक दोगुनी दिखाई गई, जबकि वास्तविकता में उतनी फसल मंडी पहुंची ही नहीं थी। इस अतिरिक्त 'कागजी धान' के जरिए करोड़ों रुपये की सब्सिडी और सरकारी भुगतान को ठिकाने लगाया गया है।
| घोटाले का मुख्य केंद्र | अनुमानित राशि | कथित संलिप्त विभाग | फर्जीवाड़े का मुख्य तरीका |
|---|---|---|---|
| पिहोवा अनाज मंडी, कुरुक्षेत्र | ₹100 करोड़ से अधिक | कृषि एवं राजस्व विभाग (Revenue) | फर्जी पंजीकरण व डबल वेरिफिकेशन |
| प्रभावित रिकॉर्ड | हालिया जमाबंदी वाले गांव | राइस मिलर्स व कमीशन एजेंट्स | किसानों के डेटा का दुरुपयोग |
अधिकारियों और राइस मिलर्स के बीच 'अपवित्र गठबंधन'
किसान नेता ने सीधे तौर पर प्रशासनिक तंत्र पर सवाल उठाते हुए कहा कि बिना कृषि विभाग और राजस्व विभाग के अधिकारियों के डिजिटल हस्ताक्षर और भौतिक सत्यापन (Physical Verification) के इस तरह का फर्जीवाड़ा संभव ही नहीं है। अंतिम सत्यापन की जिम्मेदारी इन्हीं विभागों की होती है, ऐसे में एक ही फसल को दो बार सत्यापित करना उनकी सीधी भागीदारी को दर्शाता है।
"सरकार एक तरफ पारदर्शिता का दावा करती है, लेकिन पिहोवा में जो हुआ वह सिस्टम की विफलता का सबसे बड़ा प्रमाण है। असली किसानों की जमीन पर फर्जी लोग फसल बेच रहे हैं और अधिकारी अपनी आंखें मूंदकर बैठे हैं। यह 100 करोड़ से भी बड़ा घोटाला हो सकता है यदि इसकी निष्पक्ष न्यायिक जांच कराई जाए।" - प्रिंस वड़ैच, किसान नेता
स्थानीय जनजीवन और किसानों पर प्रभाव
इस कथित घोटाले का सबसे बुरा असर उन ईमानदार किसानों पर पड़ रहा है जो अपनी फसल बेचने के लिए 'मेरी फसल-मेरा ब्यौरा' पोर्टल पर निर्भर हैं। जब उनके नाम का डेटा पहले ही फर्जीवाड़े में इस्तेमाल हो जाता है, तो उन्हें अपनी वास्तविक फसल बेचने में तकनीकी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा, सरकारी खजाने की इस लूट का सीधा असर कृषि विकास योजनाओं के बजट पर पड़ता है।
पिहोवा और आसपास के क्षेत्रों के किसानों में इस खुलासे के बाद भारी रोष है। स्थानीय व्यापारियों का मानना है कि इस तरह के घोटालों से पूरी मंडी की साख गिरती है और ईमानदार कमीशन एजेंटों को भी शक की निगाह से देखा जाने लगता है।
आगामी कार्रवाई और प्रशासनिक रुख
किसान संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि इस मामले में जल्द ही उच्च स्तरीय जांच (SIT) गठित नहीं की गई और दोषी अधिकारियों व राइस मिलर्स के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं हुई, तो वे बड़ा आंदोलन शुरू करेंगे। फिलहाल, जिला प्रशासन की ओर से इस मामले पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन सूत्रों का कहना है कि विजिलेंस विभाग इस इनपुट्स पर अपनी प्रारंभिक जांच शुरू कर सकता है। आने वाले दिनों में कृषि विभाग के कुछ कर्मचारियों पर गाज गिरना तय माना जा रहा है।





